Google+ Followers

Monday, April 14, 2014

तू है मेरी दोस्ती

जिंदगी ने एक दिन पूछा मुझे बतला जरा ,
जी जो तूने जिंदगी ये जिंदगी कैसी लगी ।

मैं भी क्या कहती जरा इतरा के इतना ही कहा ,
क्या करूं तेरी बुराई जैसी थी अच्छी  लगी । ।
                                *
मिल गई इक दिन ख़ुशी रोका गली के मोड़ पे ,
पूछती थी ये बता मैं कब मिली कितनी मिली ।

ये सोचकर की रूठ न जाये ख़ुशी मैंने कहा ,
खुश हूँ मैं इतने में ही तू जब मिली जितनी मिली ।
                                 *
आशिकी इक दिन गले लगके लगी कहने मुझे ,
दिल्ल्गी में रह गई या की कभी दिल की लगी ।

आँख भर आई मेरी पर सोचकर ये चुप रही ,
क्या दिखाऊं जख्म दिल के क्या कहूँ दिल की लगी ॥
                                  *
रो रही थी जब अकेली दो हाथ आये आँख पर ,
बोली मैं हूँ कौन कह और खिलखिलाके हँस पड़ी ।

सुनके मैं उसकी हँसी पहचान के उससे कहा  ,
तू मेरी नटखट सहेली तू है मेरी दोस्ती ।



No comments:

Post a Comment