Sunday, July 16, 2017

वसंत

हारों का मौसम , नज़ारों का मौसम ,
है आया धरा के  ,   श्रृंगारों का मौसम  ,

झरें पीले पत्तें , थी सूनी सी डाली ,
लगे नए पल्लव . अब छाई हरियाली ,

है सजने लगे अब  लताओं की लड़ियाँ ,
कली खोलती , धीरे-धीरे पंखुरियां ,

लगने लगे आम-लीची पे मंजर   ,
भंवरा भटकता है , बौराया बनकर ,

चलने लगी है , वसंती हवाएँ ,
घुसती है तन में , और मन गुदगुदाए ,

खड़े प्रेम के देवता, लेके तरकश ,
सामने लगा कोई, ख्वाबों में बरबस ,

हाथों में वीणा ,हैं आसन कमल के ,
आई धरा पे है,  वागीशा  चलके ,

मिटाती अँधेरा, लुटाती है सदगुण ,
जला ज्ञान दीपक, हटाती है अवगुण ,

दीवाना है अम्बर, मचलती जमीं है,
है सबको पता , ये वसंत पंचमी है || 

होगी ठिठोली होली में

नीले - पीले,लाल - गुलाबी , रंग उड़ेंगे होली में  ,
रूठे-टूटे , छूटे - रिश्ते , संग जुड़ेंगे होली में  ,

भूली बिसरी कई कहानी , याद करेंगे होली में ,
कोरे मन पे खुशियों वाली , रंग रंगेंगे होली में ,

बड़े बूढ़े सब बनेंगे बच्चे , शोर मचेगी होली में ,
चौक चौराहे गली मुहल्ले , खूब सजेंगे होली में ,

यारों के संग मिलके करेंगे , सब मनमानी होली में ,
नहीं चलेगा कोई बहाना , आनाकानी होली में  ,

दिल की दूरी ख़तम करेंगे , गले लगा के होली में ,
मन के सारे भरम मिटेंगे , मिलके-मिलाके होली में ,

महकेगा घर का हर कोना , पकवानों से होली में ,
भरा रहेगा घर और आँगन , मेहमानों से होली में ,

कहीं पे होगी हाथापाई , जोरा-जोरी होली में ,
कहीं मिलेंगे सबसे छुपके , चाँद-चकोरी होली में ,

कहीं पे सजनी कहती साजन , घर आ जाना होली में ,
प्यार के वादे अपने इरादे  ,  ना  बिसराना होली में ,                  

देश में माँ परदेस में बेटा , दिल ना माने होली में ,
गाँव गली वो संगी साथी  , बसे पुराने होली में ,

तन्हा अकेला बैठा दीवाना , रोये दिवानी होली में ,
कहीं ख़ुशी की लहर कहीं पे , आँख में पानी होली में ,

दुःख दर्द और गम की बातें , चलो भुलाये होली में ,
मार के मन की कुंठाओं को , जश्न मनाये होली में, 

आँखों के रस्ते से छुपके , दिल में समाये होली में ,
रंग में थोडा प्यार मिलाके , सबको लगाये होली में ,

बैर भुलाके करे दोस्ती , हाथ बढ़ाये होली में ,
ऐसा रंग लगाये अबकी , छुट न पाए होली में ,

आज लगे हर लड़की राधा ,कान्हा निकले टोली में ,
थोड़ी मस्ती थोड़ी शरारत , होगी ठिठोली होली में || 



प्राकृतिक आपदायें

प्रलय का ही दूसरा  नाम है   ये,
तबाही की खातिर बदनाम है ये ,
 काल सा लहरों का शोर लिए ,
युग के उत्थान का तोड़ लिए ,
आके ये जग को मिटाता फिरे ,
बहावों में सबको बहाता फिरे ,
है इसके लिए न परिधि बनी ,
 जाने क्यूँ जग से है इसकी ठनी,
बनते को पल में बिगाड़ा करे, 
संवरों की सूरत उजाड़ा करे ,
आता है बस तोड़ने हौसले ,
कहे रोक सकता है तो रोक ले  ,
ललकारे ये बेबस खड़ी जिंदगी ,
लगती है छोटी बड़ी जिंदगी 
सुनो आपदायें मेरी बात को ,
नहीं तुममे ताकत हमें मात दो ,
है मानव मरा पर आशा न मरी ,
जीने की जिजीविषा न मरी ,
हैं गम ऐसे पहले भी आते रहें ,
मानव धर्म अपना निभाते रहें ,
तुम्हे आता है गर मिटाना हमें,
आता है बिगड़ा बनाना हमें ,
माना की सदमा बहुत है बड़ा ,            
आघात दिल पे किया है कड़ा,
लेकिन है जबतक बची जिंदगी ,
गम में भी हम ढूंढ़ लेंगे ख़ुशी ,
देंगे मिशालें जो हम प्यार के ,
जाना पड़ेगा तुम्हे हार के || 

मन में मुस्काती है आशा

बस आखिरी साँस ही बांकी है , फिर भी जीने की अभिलाषा ,
लगती है दुनिया विष जैसी , पर मिटे न पीने  की आशा | 

है पता की वो न आएगा , जो चला गया है इस जग से ,
लगती है झूठी सच्चाई  ,  सच उसके आने की आशा | 

वो फँसा हुआ है उलझन में , कई सालों से कई अरसों से ,
मिटता जाता है जीवन पर , मिटती ही नहीं मन की आशा | 

उम्मीदों का इक गुलशन है ,  ख्वाबों के फूल लगे जिसमें , 
अरमानों के इस सागर का  , पतवार है जीवन की आशा | 

अँधेरे में बन के ज्योती , आ जाती चुपके से मन में ,
उसर-बंजर धरती पर भी , कुछ सपने बोती है आशा | 

बनके तोहफे दरवाजों पर , रहती है मुसीबत खड़ी हुई ,
जब लगती है गम की मूर्छा , संजीवनी होती है आशा  ,

कुछ बुरा नहीं कुछ भला नहीं , जो होता है वो होनी है , 
आने वाला कल अपना है , ढाढस  दे  जाती है आशा |  

जो हर गया उससे पूछो , कैसे वो जीत सका खुद को ,
आँखों में दर्द भरा लेकिन , मन में मुस्काती है आशा || 

दुश्मन मेरे

तुम न होते तो ये जीवन नीरस होता,
बेकल न होता मन दिल चैन न खोता,
बेपरवाह सी होकर चलती जीवन गाड़ी,
आसानी से कटती जाती उम्र ये सारी | 

गर तुम  आकर राहों में कांटे न बोते ,
आज जो अनुभव पास है मेरे पास न होते ,
जीवन के दुर्गम रस्ते आसां  हो जाते ,
फिर कैसे हम अपनी शक्ति को आजमाते | 

तुमने मुझे सिखाया बिगाड़ा काम बनाना ,
अपमानों से बढ़के आगे नाम कमाना ,
तुम ने चाहा जब भी देना गम का तोहफा,
एक नया गुण बचने का हमने भी सिखा | 

तुम ने कदम हमारे बढ़ते जब जब रोके ,
बढे और हम आगे ज्यादा साहसी  होके ,
जब भी हमे दबाने का है तुमने सोंचा ,
और उठाया हमने अपने सर को ऊँचा |  

माना तुम हो दोस्त नहीं, हो दुश्मन  मेरे ,
लेकिन जो हूँ आज मैं हूँ सब कारण तेरे ,
रात न हो तो दिन की महिमा कैसे जानें  ,
गम के बाद ही खुशियों के दिन लगे सुहाने  || 

मेरे सच हसीन थे

ये गम नहीं की गैरों ने कस्ती है डुबोई
हैं गम मुझे अपने खड़े तमाशबीन  थे ,

रह-रह के उसको दर्द ये बेचैन करता हैं ,                                                           
उसके ख़ाब से ज्यादा मेरे सच हसीन थे|| 

मेरा दीवाना न आया

मगरूर कह के हमें चल दिए वो , जो जज्बात हमको बताना न आया 
बहुत देर ठहरे वो देखेंगे मुड़के , पर आवाज देके बुलाना न आया ,                            

बढाती गई दूरियां गलतफहमी , मगर हमें उलझन सुलझाना न आया
वो सुनने को सच्चाई राजी हुए ना , और हमको करना बहाना न आया, 

 कहते रहे वो  और सुनते रहे हम , हमें हाले दिल भी सुनाना न आया
है उनके लिए खेलना दिल से आसां , हमें पैंतरे वो चलाना न आया , 

देतें है वो दोस्ती की दुहाई  ,  जिन्हें दोस्ती को निभाना न आया
 इतनी सी हमसे खता हो गई , हमें अपना दामन छुड़ाना  न आया,

नाराजगी दूर करते तो कैसे , हमें उनके नखरे उठाना न आया 
 पूछा न उसने बताया न हमने करे क्या दिल को बहलाना न आया,

है नाज  उनको फितरत पे अपनी , हमें वो सलीका दिखाना न आया
गिराकर हमीं को हमारी नजर में , गया वो जो मेरा दीवाना न आया ,

मिलतें है दो दिल बड़ी मुश्किलों से , करे क्या दिल को मिलाना न आया
बीतेगी अब उम्र इस कसमकस में , वापस फिर क्यूँ वो जमाना न आया,

आदत बुरी तो नहीं रूठने की , करूँ क्या जो हमको मानना न आया
ये माना की हम न उन्हें रोक पाए , उन्हें भी तो वापस आना न आया ||