Friday, April 11, 2014

प्रिये मित्रों

प्रिये मित्रों , एक छोटी सी इल्तजा है आप सब से,
मैंने हमेशा आप लोगों की पसंद का ख्याल रख कर शायरी की है , जिस प्रकार की शायरी ज्यादा देखि गई ,मैंने उसे आपकी पसंद समझ कर वैसी ही शायरी लिखने की बार - बार कोशिश की। ....... पता नही कितनी कामयाब हुई। …… आज बस यही जानने की जिज्ञासा हुई है की आप को मेरी शायरी कैसी लगती है  अथवा आप किस तरह की शायरी पढ़ना पसंद करते हैं । अतः अपने देश और विदेश के सभी पाठक मित्रों से अनुरोध है की मेरे ब्लॉग से जुड़कर (फॉलो माई ब्लॉग ) मुझे अपने भाव से अवगत कराएं । (बाई ई मेल या कॉमेंट ) । 

अलविदा

ले अपने साथ दोस्ती की निशानी ले जा ,
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ये मेरे दर्द मेरी आँख का पानी ले जा ।


दोस्त बुलाता नही कोई

इक तू नही शिकवा-गिला करता नही कोई ।
इक तू नही दिल से मिला करता नही कोई ।।

कहता नही सुनता नही कोई भला - बुरा ,
इक तू नही कोई दर्द समझता नही मेरा ।

उलझन ये जमाने की दुनियां के झमेले ,
इक तू नही चुपचाप ही सहते हैं अकेले ।

बेरंग से लगते हैं ये मौसम ये बहारें ,
इक तू नही भाते नही हसीन नजारे ।

कोई रूठता नही है मनाता नही कोई ,
जो तू नही तो दोस्त बुलाता नही कोई ।

Thursday, April 10, 2014

तू बोल करूं पेश क्या तेरे हुजूर में

तू बोल करूं पेश क्या तेरे हुजूर में । 
तू जान भी मांगे अगर लाऊँ जरूर मैं । 

देखूं तो वफ़ा तेरी पहुँचती कहाँ तक ,
देखूं तो वफ़ा मेरी है कितने सुरूर में । 

आजमां तू खुदको है कितना तुझे यकीन  
ले आजमां रहा हूँ खुद को जाके दूर मैं ।



Wednesday, April 9, 2014

हादसा ऐसा कभी होता तो नही था

हादसा ऐसा कभी होता तो नही था ।
दिल इस कदर बेचैन था सोता ही नही था ।

इक दिल का खरीदार था कुछ इस कदर चालाक ,
ले लेता था वो दिल दिल देता ही नही था ।

इक याद आ रहा था वो ही दिल को बार - बार ,
जाके भी दूर दिल से वो जाता ही नही था ।

वो मुस्कुरा के देखता मैं मांगती थी दिल ,
दिल मेरा उसके पास से आता ही नही था ।

दिल लेके वो चला गया मैं देखती रही ,
वो मुड़के एक बार देखता भी नही था ।
















Tuesday, April 8, 2014

नजर क्यूँ फेर लेते हो

नजर मिलते ही ना जाने नजर क्यूँ फेर लेते हो ।
हवा करते हो जख्मों को दर्द को छेड़ देते हो ।

कभी तुम आजमाना दिल को कितना दर्द होता है ,
कि जब अपने ही अपनों को अकेला छोड़ देते हो ।

भुला बैठे जो सब वादे इरादे तुम मुहब्ब्त के ,
तो क्यूँ छुप - छुप के गैरों से हमारी खैर लेते हो ।

मुहब्ब्त तुम में भी है मुझमे भी है हर शै में बसती है ,
वफ़ा ठुकरा के क्यूँ मेरी खुदा से बैर लेते हो ।

Monday, April 7, 2014

रिस्ते भी हैं रंगों जैसे

कुछ रिस्ते ऐसे उलझे थे ,
सुलझाते - सुलझाते टूट गये ।

वो आये हमको समझाने ,
खुद जाते - जाते रूठ गये ।

वो दर्द दबाकर बैठे थे ,
हँस -हँस के सबसे मिलते थे ,
हमने जो हाल जरा पूछा ,
वो हाल सुनाते टूट गये ।

इक माँ बाबूजी जब तक थें ,
भाई - भौजाई अपने थे ,
इक वो न रहे जो दुनियां में ,
सब रिस्ते - नाते टूट गये ।

रिस्ते भी हैं रंगों जैसे ,
कुछ कच्चे -पक्के होते हैं ,
कुछ रंग उमर भर ना निकलें ,
कुछ रंग लगाते छूट गये ।