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Friday, October 28, 2016

टूटा हुआ मैं पत्ता

टूटा हुआ मैं पत्ता  ,  ना घर है ना  ठिकाना ।
ले चल हवा तू मुझको , जिस ओर हो ले जाना ।

तूफ़ान का मारा  हूँ , किस्मत से मैं हारा  हूँ ,
किसी डाल पे था कलतक , अब दरबदर पड़ा हूँ ,
मेरी ख्वाहिशें घरौंदा , मेरे ख़ाब आशियाना ।
टूटा हुआ मैं पत्ता  ,  ना घर है ना  ठिकाना ।

न हिन्दू न मुसलमां हूँ , इक भूली दास्ताँ हूँ ,
सारा जहाँ है मेरा , पर मैं न किसी का हूँ ,
मजहब मेरी मुहब्बत , तबियत है आशिकाना ।
टूटा हुआ मैं पत्ता  ,  ना घर है ना  ठिकाना ।

बारिश में भी जला मैं  ,  पत्थर पे भी चला मैं ,
राहों  में  दिन गुजारा  ,  दुश्वारी  में  पला  मैं ,
मुझे याद बहुत आयें , गुजरा हुआ जमाना ।
टूटा हुआ मैं पत्ता  ,  ना घर है ना  ठिकाना ।

मंजिल न जाने क्या हो , ठहराव कब कहाँ हो ,
किसको पता है कल का , है आज कल कहाँ हो ,
हम ना रहेंगे  फिर भी , आएगा दिन सुहाना ।

टूटा हुआ मैं पत्ता  ,  ना घर है ना  ठिकाना I

3 comments:

  1. बहुत सुंदर ... टूटे पत्ते की का जीवन ... संवेदनशील लिखा है

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