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Friday, October 17, 2014

मुस्कुराना भूल जाती हूँ

मैं गम में देख उस को मुस्कुराना भूल जाती  हूँ ।
उसे जब याद रखती हूँ जमाना भूल जाती  हूँ ।

कहीं मैं खो न दूँ उस को मुझे इस बात का डर है ,
यही सब सोंचकर चाहत जताना भूल जाती  हूँ ।

ये यादें दर्द अब मुझको जियादा दे नही पातें  ,
नया कुछ देखती हूँ तो पुराना भूल जाती  हूँ ।

हवाएँ रूठकर मुझसे शिकायत कर के यूँ बोली ,
मैं अब सावन में भी झूला लगाना भूल जाती हूँ ।

यूँ रोटी- दाल में ही अपनी अब मसरूफ रहती हूँ ,
की मैं चिड़ियों को भी दाना खिलाना भूल जाती  हूँ ।

ये आँगन में जो तुलसी है हरी थी जब तलक थी माँ ,
मैं अब पौधों को भी पानी पिलाना भूल जाती  हूँ ।

न जाने कब से अँधेरा है मेरे दिल के कोने में ,
दिया दिल में जलाना है जलाना भूल जाती  हूँ ।

वो रिश्तेदार हैं इतनी सी अब पहचान है उनसे ,
मैं भी उनकी तरह रिश्ता निभाना भूल जाती  हूँ । ।


2 comments:

  1. कहीं मैं खो न दूँ उस को मुझे इस बात का डर है ,
    यही सब सोंचकर चाहत जताना भूल जाती हूँ ...
    बहुत ही पंडा ... लाजवाब शेर इस खूबसूरत बहर में .... पोरी ग़ज़ल पढ़ कर मज़ा आ गया ...

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  2. Digamber Naswa ji बहुत - बहुत शुक्रिया

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