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Wednesday, October 1, 2014

खुशियों का मुझसे हमेशा फासला रक्खा गया

खुशियों का मुझसे हमेशा फासला रक्खा गया ।
दूर मुझसे हसरतों का काफिला रक्खा गया ।

उनसे सच कह दें मगर है फायदा कुछ भी नही ,
अन्धे को क्या, सामने हो आईना रक्खा गया ।

रात सूनी शाम काली जिंदगी अँधेरी हो गई  ,
जब बुझाकर ताक पर दिल का दिया रक्खा गया ।

इक तरफ मेरी मुहब्बत इक तरफ सारा जहाँ ,
हाशिये पर इस तरह वादे - वफ़ा रक्खा गया ।

सब समझते हो मगर चाहत समझते ही नही ,
फिर समझने को भला दुनियाँ में क्या रक्खा गया ।।



2 comments:

  1. waaaah... bahut umda hai....
    hashiyevalaa she'r .. kya kheni waaaah

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  2. shukriya Ashok ji ......... aap jaise shayri ke kdrdanon ki duaa hai sb

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