Google+ Followers

Tuesday, September 2, 2014

अब बेचारा दिल बेघर है

कल तन्हाई से डरता था ,
दिल को अब महफ़िल से डर है ।

सब हेरा-फेरी है दिल की ,
ये सारे झगड़े की जड़ है ।

मेरे पाओं में बेड़ी है ,
आँखों में सपनों का घर है ।

बेगैरत की खातिर आँसूं ,
क्यूँ ये जिल्ल्त मेरे सर है ।

उनके दिल से बाहर आकर ,
अब बेचारा दिल बेघर है ।।



2 comments: