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Wednesday, May 1, 2013

टूटते हैं रोज सपने

टूटते तारों के जैसे टूटते हैं रोज सपने ,
सोंचते हैं हम भी अब ख़ाब बुनना छोड़ दें।

एक ही थी आरजू वो भी नही सुनता खुदा ,
बेकार है फिर बन्दगी सब कहना सुनना छोड़ दें  ।

हर हाल में जीना पड़े ये भी कहो कोई बात है ,
इतनी आजादी तो मिले जब चाहे जीना छोड़ दें। 

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